अजन्मी कन्या की आवाज़:महिला दिवस विशेष

अजन्मी कन्या की आवाज़

माँ मुझे डर लगता है

कहीं समाज के डर से

तू मुझे खो न दे माँ

मुझे जन्म लेना है

तेरे ऑचल में बड़ा होना है

पिता की गोद में बैठ्ना है

भाई के साथ खेलना व पढ्ना है

दादी से कहानी भी सुननी है

दादजी के कांधो पर बैठ् मेला देखना है

पर माँ मैं डरती हूँ

कहीं समाज के डर से

तू मुझे खो न दे

तुझसे गुहार है माँ

मुझे जन्म लेने दे

माँ तेरा हाथ बटाना है

तेरे साये मै बैठ

माँ मुझे टेड़ी मेड़ी रोटी बनाकर

बापू को खिलानी है

तुझ से ही तो गोल गोल रोटी

बनाना सीखनी है माँ

तेरे सारे गुण सीखने है

माँ तूने भी तो जन्म लिया है

अब मेरी पारी है

माँ मुझे जन्म लेने दो

तुम्हे तो पता है

मै क्या मांग रही हूँ

माँ तू घबराना नही

मुझे जन्म तो लेने दो

तेरे अपने घर को

खुशी से भर दूंगी

सभी को प्यार परोस कर

अपना पेट भर लूंगी

वक्त आने पर

सभी का सहारा बनूंगी

तू समझ रही है न सुन रही है न

मैं क्या कह रही हूँ

लड़्के का जन्म जैसे कुल दीपक होता

इस सोच को बदलना है मॉ

इस कुल दीपक की ज्वाला को

मुझे ही तो जलाना है

मैं तो घर लक्ष्मी होकर आना चाह्ती हूँ

तुझे पता है,लड़्की पराया धन होती है

मुझे भी पराया होना है

डोली मै बैठ कर जाना है

पराया धन होकर भी

दो घर की लक्ष्मी होना चाह्ती हूँ

समाज को बेटी बचाओ के नारे से

बुलंद करना चाहती हूँ

बेटे और बेटी के भेद को

मिटाना चाहती हूँ

मुझे जन्म लेने दो माँ

तेरी ही कोख से जन्म लेकर

कन्या को नकार ने की मानसिकता में

परिवर्तन लाना चाहती हूँ

गर्व से तेरे और मेरे होने का

एह्सास दिलाना चाहती हूँ

बापू का भी सर गर्व से उठाना चाहती हूँ

मुझे जन्म तो लेने दो

माँ बस अब जन्म दे ही दो !

साभार:श्री अनुज भार्गव

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