ऑर्गेनिक फार्मिंग और रसायनिक खेती का सच || Truth behind organic and chemical farming

जहाँ एक ओर ऑर्गेनिक फार्मिंग (रसायनमुक्त)और कैमिकल फार्मिंग(रसायनयुक्त) के बीच देश के वैज्ञानिक,बुद्धिजीवी और किसान दो दो हाथ कर रहे हैं।कोई कहता है कि रसायनिक खेती से लोगो में अनेक-अनेक बिमारियाँ फैल रही हैं और रसायनिक खेती छोड हमे जल्द से जल्द रसायनमुक्त खेती अपना लेनी चाहिए।इसको करने की विधियाँ बताने के लिए देश मे बहुत सी संस्थाएँ काम कर रही हैं। ऑर्गेनिक खेती, जीरो बजट खेती, नेचुरल फॉर्मिंग,जैविक खेती करवाने के नाम पर गाय के गोबर,मूत्र ,जीवामृत, अमृत जल, अमृत मिट्टी,डी कम्पोजर,केंचुआ खाद,दसपर्णी अर्क इत्यादि का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।वहीं दूसरी ओर देश के ज्यादातर कृषि विश्वविद्यालय,कृषि वैज्ञानिक अौर रसायनिक खाद बनाने वाली कम्पनियाँ प्रचार कर रही हैं कि बिना रसायन के खेती करना मुश्किल है और उत्पादन भी कम है अतः ज्यादा उत्पादन के लिए रसायनिक खेती करनी चाहिए परन्तु इतना सब कुछ होने के बाद भी स्थिति वही ढाक के तीन पात वाली ही है।बेतहासा मेहनत के बाद भी सम्पूर्णदाता(किसान) को कोई लाभ नही हो रहा है अौर उसके हिस्से सिर्फ आत्महत्या ही आ रही है।

य-ूटयूब,वाटसएप्प और अन्य सोशल नेटवर्किंग माध्यम से ऑर्गेनिक खेती करके एक एकड से लाखो-करोडो कमाने के दावे करने वाली ऐसी भ्रामक जानकारियाँ लोगों को दी जा रही हैं। जिससे भोला-भाला संपूर्ण दाता(किसान) लालच के वशीभूत होकर इनके जाल मे फँस जाता है।काफी समय और धन बर्बाद करने के बाद उसे समझ आता है कि उसे ज्यादा कमाई के नाम पर उल्लू बनाया गया।

मैं भारत के ज्यादातर हिस्सों में गया हूँ,जहाँ कई लोग ऑर्गेनिक खेती,जैविक खेती,ऋषि कृषि,जीरो बजट खेती इत्यादि के प्रयोग कर रहे है लेकिन ऑर्गेनिक खेती से मुझे एक भी सन्तुष्ट व्यक्ति नही मिला जो सीना ठोककर ये कह सके कि मैंने इसे (ऑर्गेनिक खेती)आत्मसात करके अपने लालच पर काबू पा लिया हो।देश मे ऑर्गेनिक खेती करने वाले जितने भी लोगो से मैं मिला तो मैने पाया कि गौ-पालन,ऑर्गेनिक खेती,ऋषि कृषि,जैविक खेती,प्राकृतिक खेती,जीरो बजट खेती इत्यादि के नाम पर उन्होने अपनी सुव्यवस्थित दुकाने/व्यापार चलायी हुई हैं ।जहाँ पर लालच के वशीभूत आये लोगों को लूटने,ठगने का काम हो रहा है।

कोई कहता है कि ऑर्गेनिक खेती से लाभ(धन) मिलेगा,कोई कहता है कि जैविक खेती करके मालामाल हो जाओगे ,तो कोई प्राकृतिक खेती को सच्ची अौर अच्छी खेती बताने में लगा है।सबकी अपनी ढपली अपना राग है परन्तु सभी के मूल में सिर्फ और सिर्फ लालच ही छिपा है।सीखाने वाले को भी लालच है और सीखने वाले को भी लालच है।लालच भी किसका,सिर्फ और सिर्फ ज्यादा से ज्यादा धन कमाने का।इस धन का प्रयोग वो संसाधन इक्टठा करने मे करते है और ये संसाधन प्रकृति का,खेती का सर्वनाश कर रहे हैं परन्तु इस ओर उनका ध्यान ही नही जाता।

प्रकृति द्वारा बनायी गयी व्यवस्था को जान्ने,समझने की ओर किसी का भी ध्यान नही है।इस पृथ्वी पर हजारो-लाखों किलोमीटर में फैले घने वन/जंगल युगो युगान्तरो से विद्यमान है।जहाँ मानव का कोई हस्तक्षेप नही है।वहाँ न कोई जमीन जोतने जाता है,न कोई बीज बोने जाता है,न निराई-गुडाई,न कोई खाद,न कोई कीटनाशक-फफूँदीनाशक और न जल देने ही कोई जाता है लेकिन फिर भी वहाँ उगने वाली घास,पौधे,बेल,पेड अौर वृक्ष दुनिया में सबसे स्वस्थ,निरोगी, पोषक तत्वों से भरपूर और उत्पादन में सर्वोत्तम है।वन/जंगल में पैदा होने वाले फूलों और फलों का परिक्षण आप दुनिया की किसी भी प्रयोगशाला में करा लिजिए उनके गुण-धर्म,पोषक तत्व और उत्पादन मानव के द्वारा किसी भी विधि से उगाये गये फूलों अौर फलों से कहीं बेहतर आयेगा।

उदाहरण के लिए बताता हूँ कि ग्रेटर नोएडा के सेक्टर गामा 2 मे मकान संख्या G 836 के सामने पक्के रोड के किनारे उग आये एक अरहर के पौधे को मैं पिछले कई माह से लगातार बढते हुए देख रहा हूँ।ऐसी विषम परिस्थितियों में कि जहाँ उसे एक बूँद पानी भी कोई नही दे रहा है और न ही कोई देखभाल करने वाला है परंतु फिर भी वह लगातार अच्छी प्रगति कर रहा है और अब तो उसकी फलियाँ भी पक कर तैयार हो चुकी हैं। फलियों के अंदर बने दाने इतने शानदार हैं कि शायद कोई अपने खेत पर भी लगाता तो इतनी अच्छी किस्म के दाने पैदा नहीं कर सकता था। उस अरहर के पौधे और दाने का चित्र मैं यहां लगा रहा हूं।यदि कोई साक्षात उसे देखना चाहता है तो गामा 2 में जाकर देख सकता है। यह पौधा हमारे लिए कोई चमत्कार हो सकता है परंतु प्रकृति की यह एक सामान्य प्रक्रिया है ,जहां पर एक बीज किसी पशु-पक्षी या हवा के माध्यम से रोड के ऊपर पहुँच गया और थोड़ी सी मिट्टी और पानी का स्पर्श मिलने के बाद उसमें अंकुरण निकल आया ।चारों ओर पक्का होने के बावजूद और खाद- पानी एवं देखभाल की कोई व्यवस्था न होने के बाद भी वह न सिर्फ बढा बल्कि उसने शानदार उत्पादन भी किया।

अब सवाल पैदा होता है कि ऐसा क्यों हुआ कि ज्यादा लागत,ज्यादा देखभाल,ज्यादा मेहनत,अच्छे बीज और ज्यादा बेहतर तकनीको के बावजूद भी हम प्रकृति की अपनी व्यवस्था में पैदा हुई चीजों की ,न तो गुणवत्ता,न उत्पादन और न ही स्वाद की बराबरी कर पा रहे हैं।

तो इसका बहुत सरल सा जवाब है,हमारा लालच।जी हाँ आपने सही पढा लालच।

प्रकृति ने मिटटी,जल,वायु,पेड-पौधों, वनस्पतियों,जीव-जन्तुओ,पशु-पक्षियों और मानव की एक सुव्यवस्थित श्रंखला/चक्र बनायी हुई है।जिसमें सभी का अपना एक कार्य निश्चित है और वो एक स्वतन्त्र इकाई के रुप में लगातार इस कार्य को करते है।और इस कार्य को हम उत्पादन के रुप मे जानते है।इस उत्पादन में सभी का उसके कार्य और आवश्यकता के अनुसार एक हिस्सा तय है जो उसे मिलता रहता है।यह परम्परा लाखों-लाख साल से चलती रही परन्तु मानव ने अपना विकास करने के नाम पर प्रकृति के इस चक्र को तोड दिया और धीरे धीरे प्रकृति से मिलने वाले सम्पूर्ण उत्पादन पर उसने अपना हक जमाना और अधिकार करना शुरू कर दिया।इस प्रकार मानव जो पहले प्रकृति में एक इकाई के रुप में काम कर रहा था वो अब उससे बाहर निकलकर उसके केन्द्र बिन्दू के रुप में आ गया। जल,वायु,मिटटी(धरती),पेड-पौधों,वनस्पतियों,जीव-जन्तुओ अौर पशु-पक्षियों पर नियंत्रण करने लगा,उन्हे अपना गुलाम समझने लगा।पहले वो(मानव)जिनका साथी था,सहयोगी था, वो अब उनका मालिक बन बैठा।मानव के अलावा बाकी सभी इकाईयाँ आज भी पूरी इमानदारी के साथ अपना कार्य कर रही है परन्तु मानव लगातार प्रकृति के चक्र को न सिर्फ तोड रहा है अपितु अब तो वह उसे नष्ट भी करने पर अमादा है।

टीकम सिंह
(स्वदेशी प्रचारक)

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