दो शब्द

टीकम सिंह

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सबको दो शब्द बोलने के लिए कहा जाता है लेकिन मैं दो शब्द नही बल्कि दो शब्दों पर बोलूंगा। यूं तो अटल जी के सैकड़ों ऐसे शब्द हैं जो मुझे बेहद पसंद हैं लेकिन जिस प्रकार यदि आप से पूछा जाए कि आपको कौन से गाने सबसे ज्यादा पसंद है तो आप के ह्रदय के जो सबसे पास होते हैं वही गाने आपको अनायास याद आते हैं। ठीक उसी प्रकार मुझे अटल जी के दो शब्द बेहद पसंद हैं और वे दोनों ही शब्द एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत है।एक जमीन से जुड़ा हुआ बेहद सामान्य शब्द है और दूसरा बेहद कठिन और आमजन की पहुँच से दूर का शब्द है लेकिन अटल जी ने दोनों ही शब्दों को इतने बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल किया है और उन दोनों शब्दों को जो ऊंचाई उन्होंने दी है वह शायद ही कोई और दे पाता।

दोनों शब्दों में भिन्नता होने के बावजूद एक फर्श पर और एक अर्श पर होने के बावजूद दोनों को ही को उन्होंने इतनी ऊंचाई दी कि दोनों ही को अपने सर्वोच्च पायदान पर सुशोभित कर दिया।

एक शब्द है “चिमटा” आप सभी इससे परिचित है क्योंकि बिना चिमटे के घर में रोटी नहीं बन सकती है।इतना महत्वपूर्ण कार्य करने के बाद भी यह शब्द सबके लिए इतना साधारण सा है कि कहीं कोने में ही पड़ा रहता है,इसका इस्तेमाल रसोई के अलावा शायद ही कहीं होता हो ।इस शब्द पर कभी किसी का ध्यान नहीं गया लेकिन उस शब्द का अटल जी ने जब वह विश्वास मत प्राप्त करने के लिए सदन में थे तो इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा था की “खरीद-फरोख्त कर के बनी हुई सरकार को मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा” तो आप समझिए कि उस समय उन्होंने आम बोलचाल के एक साधारण से शब्द को जिस को शायद कोई अपनी भाषा में इस तरीके से प्रयोग नहीं करता था लेकिन उन्होंने उस शब्द का कितने बड़े मंच पर और कितने सही समय पर इस्तेमाल करके उस शब्द की जो गरिमा आसमान पर पहुंचाई उसका एहसास तो शायद उस चिमटे को भी नहीं रहा होगा और ना कभी उसने सोचा होगा कि उसको इतनी ऊंचाई कोई व्यक्ति दे सकता है।

दूसरा शब्द जो जहन में आता है वह भी सदन में ही अटल जी जब पोखरण परमाणु परीक्षण पर विपक्ष द्वारा लगाये गये आरोपों का जवाब दे रहे थे तो उस समय उन्होंने एक शब्द का इस्तेमाल किया था “शलाका” यह एक बेहद ही कठिन शब्द है जो साधारणतः आम बोलचाल में इस्तेमाल नहीं होता और ज्यादातर लोगों को इसके बारे में कुछ जानकारी भी नहीं है मुझे भी नहीं थी ,उस समय तक जब मैंने सुना था ,परंतु उन्होंने इस शब्द को इस्तेमाल किया कि “हमने पोखरण परीक्षण कोई आत्म शलाका के लिए नहीं किया ,कोई पुरुषार्थ के प्रकटीकरण के लिए नहीं किया है” तो इतना गूढ़ शब्द ,उसकी जानकारी होना और उसको इतने सुंदर ,इतने प्रभावशाली तरीके से उस समय इस्तेमाल करना कि उसका प्रभाव सबसे ज्यादा निकल कर आये ऐसा सिर्फ अटल जी ही कर सकते थे और उन्होंने वही किया भी।

शब्दों की बाजीगरी करना तो बहुत लोगों को आता है लेकिन शब्दों को समझ कर निर्जीव शब्दों को जीवित करने की जो कला अटल जी जानते थे वह शायद ही कोई जानता हो और मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मैं अटल जी को जानता हूं ,वो अलग बात है कि अटल जी मुझे नहीं जानते ।

(लेखक स्वदेशी के प्रचारक है)

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