पीढी का अंतराल

◆टीकम सिंह की कलम से ◆

आज की पीढी और पुरानी पीढी में आपस में विचारों में विरोध में क्यों है ? मतभेद क्यों है? जब गहराई में जा कर के इस बात को सोचता हूँ तो समझ में आता है कि इसके मूल में अकुशल संवादहीनता है।दोनो पीढी जो संवाद एक दूसरे के साथ (पुरानी पीढ़ी अपनी नई पीढ़ी के साथ और नई पीढ़ी अपनी पुरानी पीढ़ी के साथ )कर रहे हैं उसमें कुछ कमी है। और कमी यह है कि हम दोनों ही अपने अपने विचारों को एक दूसरे पर थोंपते। दोनों ही पीढी यह मान करके चलती हैं कि हम दोनों अपनी अपनी जगह ठीक हैं और यदि प्राकृतिक रूप से देखा जाए तो वास्तव मे दोनों ठीक है भी ,बावजूद इसके जो मैंने ऊपर कहा कि दोनो पीढी अपनी-अपनी सोच एक दूसरे पर थोपना चाहते हैं और एक दूसरे को अपनी सोच के हिसाब से चलाना चाहते हैं तो उसके मूल में यह है कि जब बच्चा छोटा होता है तो हर माँ बाप निम्नलिखित तीन स्तर पर बच्चे को मजबूत करने की कोशिश करते है: –

१-आर्थिक
२-सामाजिक
३-धार्मिक
प्रत्येक मां बाप यह मानता है कि बच्चा यदि अच्छी शिक्षा प्राप्त कर लेगा तो वह आर्थिक रुप से मजबूत हो जाएगा। सामाजिक रुप से मजबूत होने के लिए उसे व्यवहार कुशल होना चाहिए। और बच्चा यदि अच्छे कर्म करेगा तो वह धार्मिक रूप से मजबूत होगा।

इन्हीं सब चीजों को सोचकर जब मां-बाप पहले स्तर पर कार्य करते हैं और ये सोचते हैं कि उसके भविष्य के लिए जो जरूरी संसाधन उसे चाहिए होंगे उनकी उपलब्धता के लिए यह अति आवश्यक है कि वह बच्चा शिक्षा ग्रहण करें और शिक्षा ग्रहण करने के लिए किसी अच्छे स्कूल में जाए। फिर चाहे उसके लिए माता पिता को कितना ही परिश्रम क्यों ना करना पड़े ,वे करते हैं और आवश्यक धन जुटाकर बच्चे को शिक्षित करने का भरसक प्रयास करते हैं।इस प्रक्रिया में ज्यादातर मां बाप और बच्चों के बीच जो संवाद होता है वह तकरीबन ठीक स्थिति में होता है क्योंकि इसमें ज्यादातर बच्चे शिक्षा की ओर अग्रसर हो जाते हैं। कुछ अपवाद ही होते हैं जो शिक्षा प्राप्त करने में असमर्थता जाहिर करते हैं।

बच्चा जब अच्छे नंबरों से पास होता है तो माँ-बाप को बेहद खुशी और संतुष्टि का भाव उत्पन्न होता है वहीं दूसरी ओर बच्चा भी अपने प्रदर्शन से गौरवान्वित महसूस करता है। यहां पर दोनों ही को एक दूसरे से कोई परेशानी नहीं होती अलबत्ता वह एक दूसरे का सहयोग करते हैं।

अच्छी शिक्षा ग्रहण करने के बाद जब बच्चा दूसरे स्तर पर पहुँचता है अौर किसी नौकरी (जो कि आजकल तकरीबन सभी मां-बाप की पहली पसंद है) या किसी व्यापार को शुरू करता है तो मां बाप उसे अपने तरीके से ढालने का प्रयास शुरू कर देते हैं क्योंकि उनके पास जीवन का काफी लंबा अनुभव होता है।वे अपनी तरफ से यह प्रयास करते हैं कि हमारा बच्चा उनके अनुभव का लाभ अपनी नौकरी या व्यापार में उठाएं ताकि कोई उनका शोषण न कर सके।उनकी भावना अच्छी होती है,उनकी सोच अच्छी होती है परंतु उनके इस संवाद को बच्चा नहीं समझ पाता क्योंकि उसे जिस प्रकार की शिक्षा दी गई है वह उसे अपने फैसले स्वयं करने की आजादी प्रदान करने की प्रेरणा देती है और फिर मां-बाप के समय में और वर्तमान समय में चीजें भी कुछ बदल सी जाती हैं तो इससे बच्चे के अंतर्मन में द्वंद शुरू हो जाता है कि पहले तो हमें पढ़ाया-लिखाया अौर ऐसी शिक्षा दिलाई जहां पर अपने फैसले हमें खुद करने की आजादी हो परंतु अब यह हमारे बीच में टीका टिप्पणी कर रहे हैं और हमें कामयाबी के रास्ते पर आगे बढ़ने से रोक रहे हैं।बच्चे की यह सोच भी किसी भी तरह से गलत नहीं है।और यहीं से मां बाप और बच्चों के बीच में संवादहीनता बढ़ने लगती है मां बाप सोचते हैं कि हमारा बच्चा हाथ से निकल गया है क्योंकि वह हमारी बात नहीं मान रहा है।और बच्चे सोचते हैं कि हमारे मां-बाप कैसे मूर्ख हैं जो हमें वह नहीं करने दे रहे जिसे करने के लिए उन्होंने हमें बचपन से तैयार किया।इसी दौरान तीसरे स्तर पर भी मां बाप बच्चे से यह उम्मीद करते हैं कि वह कोई गलत आचरण ना करें और ना ही किसी का शोषण करें तो वे यह प्रयास करते हैं कि बच्चा अच्छे कर्म करे और धार्मिक प्रवृत्ति का हो लेकिन दूसरे स्तर पर ही दोनों के बीच में मतभेद हो चुका है तो तीसरे स्तर तक पहुँचते पहुँचते स्थिति बेहद गम्भीर हो जाती है और यहीं से शुरू होता है मानसिक तनाव का सिलसिला और इस प्रक्रिया में मां बाप और बच्चे दोनों ,एक साथ, एक ही समय पर,एक दूसरे से प्रताड़ित होते हैं। यह स्थिति दोनो के लिए बड़ी ही विकट और पीडादायक होती है।जहां पर दोनों ही पक्ष गलत भी होते हैं और सही भी। कभी-कभी तो यह मानसिक तनाव इतना बढ़ जाता है की हताशा में या तो माँ-बाप अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं या बच्चे अपने जीवन का मोह त्याग कर मृत्यु की शरण में चले जाते हैं।यह स्थिति बड़ी ही भयानक है और यह लगातार भीषण रूप ले रही है।हमें शीघ्र ही चेत जाना चाहिए और इस ओर गम्भीरता से ध्यान देना चाहिए।अब समय आ गया है कि हम प्रकृति की बनाई हुई जो व्यवस्था है उसे समझें और उसी के आधार पर आचरण करें ताकि दोनो पीढी में जो संवादहीनता बढ रही है उसे रोका जा सके।

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