विश्व मौसम दिवस – 23 मार्च 2108

इस वर्ष विश्व मौसम दिवस का उद्देश्य दुनिया के पटल पर “Weather-Ready,Climate-Smart”’ अर्थात “मौसम-तैयार, जलवायु-स्मार्ट” के रूप में मनाने का है।
प्राचीनकाल में भारतवर्ष में मौसम की जानकारी पुराने अनुभवों और कहावतों के आधार पर ही प्रचलित थी, जो कई मामलों में बिलकुल सटीक बैठती थी।
घाघ व भड्डरी की कहावतें हमारे देश में खासी प्रचलित है। घाघ और भड्डरी कृषि मौसम विशेषज्ञ महानतम कवि थे। उन्होंने खेती -किसानी के अलावा सेहत, समाज, विज्ञान, शगुन-विचार, जैसे सभी सरोकारों पर अपने अनुभवों का सार जनता के लिए प्रस्तुत किया। आजकल हमें विभिन्न स्रोतों से मौसम के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है । घाघ और भडुरी की मौसम की कहावतों के अलावा भी वर्षा के पूर्वानुमान के बारे में कई और धारणाएं प्रचलित हैं, जैसे यह कि फाल्गुन वदी तृतीया को बादल व हवा हो तो अश्विन शुक्ल में तृतीया से षष्ठी तक वर्षा योग बनता है। फाल्गुन माह की अमावस्या व पूर्णिमा को गुरुवार हो तो गरीब सुखी रहते हैं।और भीइस तरह की कहावतें हमारे देश में खासी प्रचलित है।
चैत्र एकादशी को बादल गरजकर वर्षा हो तो सावन भादों कम वर्षा होती है। आषाढ़ सुदी अष्टमी, नवमी व पूर्णिमा को बादल छाएं और गरजें तो वर्षा सब प्रकार से उत्तम होती है। आषाढ़ वदी अष्टमी को चंद्रमा बादल में दिखाई दे तो यह अच्छी वर्षा का संकेत है।
हर वर्ष 23 मार्च को विश्व मौसम विज्ञान दिवस बनाया जाता है। 30 मार्च सन 1950 को विश्व मौसम संगठन संयुक्त राष्ट्र के एक विभाग के रूप में स्थापित हुआ तथा जेनेवा में इसका मुख्यालय रखा गया। भू-विज्ञान पर आधारित मौसम विभाग में कई विषयों पर शोध होता है। इस विज्ञान का उपयोग समय समय पर आने वाली बाढ़ सूखा, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा ही नहीं वरन वर्षा की स्थिति चक्रवातों की संभावनाएं एवं हवाई यातायात, समुद्री यातायात आदि को मौसम की सटीक जानकारी प्रदान कर सहायता करना है। आजकल मौसम विज्ञान अति उन्नत स्तर पर पहुंच गया है मौसम गुब्बारों, आधुनिक रडारों तथा उच्च तकनीक से युक्त कृत्रिम उपग्रहों एवं कंप्यूटरों के माध्यम से हम मौसम की सटीक जानकारी पाने की और अग्रसर हुए हैं कृत्रिम उपग्रहों द्वारा भेजे जाने वाली उच्च स्तर के चित्रों तथा उनके द्वारा फिल्टर की गई जानकारियों से हम फसलों का, उन का रकबा,व फसल का प्रकार इत्यादि हम आसानी से जान सकते हैं यही नहीं मौसम विभाग विभिन्न शहरों के उच्चतम व निम्नतम तापमान आर्द्रता वहां का प्रदूषण का स्तर भी भलीभांति पूर्वक बता सकता है।
इस दिवस को पर्व के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में बैठकों , संगोष्ठियों आदि करके किसी न किसी उद्देश्य को लेकर हर साल मनाया जाता है । मौसमविज्ञानी आपस में विचार एवं अनुभव बांटते हैं तथा इस पर चर्चा करते हैं। इस उभरते विज्ञान के ज्ञान का न केवल भारतीयों बल्कि मानवजाति के कल्याण के लिए कैसे बेहतर उपयोग किया जाए चर्चा की जाती है । आज कल तो दुनिया के करीब करीब सभी देशों में मौसम की भविष्य वाणी / जानकारी को बहुत महत्व देते हैं । यहाँ आपको ये भी बताना उचित होगा कि मौसम विज्ञान (Meteorology) है क्या ? कई विधाओं को समेटे हुए जो वायुमण्डल का अध्ययन करता विज्ञान है वही मौसम विज्ञान है। मौसम विज्ञान में मौसम की प्रक्रिया एवं मौसम का पूर्वानुमान अध्ययन के केन्द्र बिन्दु होते हैं। बैसे तो मौसम विज्ञान का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है किन्तु अट्ठारहवीं शती तक इसमें खास प्रगति नहीं हो सकी थी। उन्नीसवीं शती में विभिन्न देशों में मौसम संबन्धित आकड़ों के प्रेक्षण से इसमें गति आयी। बीसवीं शती के उत्तरार्ध में मौसम की भविष्यवाणी के लिये कम्प्यूटर और सेटलाइट के इस्तेमाल से इस क्षेत्र में एक नई क्रान्ति आ गयी।
मौसम विज्ञान के अध्ययन में पृथ्वी के वायुमण्डल के कुछ चरों weather parameter (variables) का प्रेक्षण बहुत महत्व रखता है; ये चर हैं – ताप, हवा का दाब, जल वाष्प या आर्द्रता आदि। इन चरों का मान व इनके परिवर्तन की दर (समय और दूरी के सापेक्ष) with time and space बहुत हद तक मौसम का निर्धारण करते हैं।
इतिहास
प्राचीन काल से ही मनुष्य ऋतु तथा जलवायु की अनेक घटनाओं से प्रभावित होता रहा है। वायुविज्ञान के प्राचीनतम ग्रंथ ऐरिस्टॉटल (384-322 ई.पू.) रचित ‘मीटिअरोलॉजिका’ तथा उनके शिष्यों की पवन तथा ऋतु संबंधी रचनाएँ हैं। ऐरिस्टॉटल के पश्चात्‌ अगले दो हजार वर्षो में ऋतुविज्ञान की अधिक प्रगति नहीं हुई। 17वीं तथा 18वीं शताब्दी में मुख्यत: यंत्रप्रयोग तथा गैस आदि के नियम स्थापित हुए। इसी काल में तापमापी का आविष्कार सन्‌ 1607 में गैलीलियों ने किया और एवेंजीलिस्टा टॉरीसेली ने सन्‌ 1643 में वायु दाबमापी यंत्र का आविष्कार किया। इन आविष्कारों के पश्चात्‌ सन्‌ 1659 में वायल के नियम का आविष्कार हुआ। सन्‌ 1735 में जार्ज हैडले ने व्यापारिक वायु (ट्रैड विंड) की व्याख्या प्रस्तुत की तथा उसमें हैडले ने व्यापारिक वायु (ट्रेड विंड) की व्याख्या प्रस्तुत की तथा उसमें सबसे पहले वायुमंडलीय पवनों पर पृथ्वी के चक्कर के प्रभाव को सम्मिलित किया। जब सन्‌ 1783 में ऐंटोनी लेवोसिए ने वायुंमडल की वास्तविक प्रकृति का ज्ञान प्राप्त कर लिया और सन्‌ 1800 में जॉन डॉल्टन ने वायुमंडल में जलवाष्प के परिवर्तनों पर और वायु के प्रसार तथा वायुमंडलीय संघनन के संबंध पर प्रकाश डाला तभी आधुनिक ऋतुविज्ञान का आधार स्थापित हो गया। 19वीं शताब्दी में विकास अधिकतर संक्षिप्त ऋतुविज्ञान के क्षेत्र में हुआ। अनेक देशों ने ऋतुवैज्ञानिक संस्थाएँ स्थापित की और ऋतु वेधशालाएँ खोलीं। इस काल में ऋतु पूर्वानुमान की दिशा में भी पर्याप्त विकास हुआ। 20 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में 20 किलोमीटर की ऊँचाई तक वायु के वेग तथा दिशा आदि के प्रेक्षणों के बढ़ जाने के कारण जो सूचनाएँ ऋतुविशेषज्ञों को प्राप्त होने लगीं उनसे ऋतुविज्ञान की अधिक उन्नति हुई। ऊपरी वायु के ऐसे प्रेक्षणों से ऋतुविज्ञान की अनेक समस्याओं को समझने में बहुत अधिक सहायता मिली।
भारत मौसम विज्ञान विभाग:- वर्ष 1864 में चक्रवात के कारण कलकत्ता में हुई क्षति और 1866 और 1871 के अकाल के बाद, मौसम संबंधी विश्लेषण और संग्रह कार्य एक ढ़ांचे के अंतर्गत आयोजित करने का निर्णय लिया गया। नतीजतन, 1875 में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना हुई। हेनरी फ्रांसिस ब्लैनफर्ड विभाग के पहले मौसम विज्ञान संवाददाता नियुक्त किया गए। मई 1889 में, सर जॉन एलियट तत्कालीन राजधानी कलकत्ता में वेधशालाओं के पहले महानिदेशक नियुक्त किया गए। मौसम विज्ञान विभाग का मुख्यालय 1905 में शिमला, फिर 1928 में पुणे और अंततः नई दिल्ली में स्थानांतरित किया गया। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग स्वतंत्रता के बाद 27 अप्रैल 1949 को विश्व मौसम विज्ञान संगठन का सदस्य बना।
मौसम विभाग का नेतृत्व मौसम विज्ञान के महानिदेशक करते हैं। मौसम विज्ञानी डॉ॰ के जे रमेश विभाग के तत्कालीन महानिदेशक हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग में उप महानिदेशकों द्वारा प्रबंधित कुल 6 क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र आते हैं। यह चेन्नई, गुवाहाटी, कोलकाता, मुंबई, नागपुर, नई दिल्ली और हैदराबाद में स्थित हैं।
प्रथम विश्वयुद्ध काल में वायुमंडलीय स्थितियों के अधिक और शीघ्रतम प्रेक्षणों की आवश्यकता हुई जिसकी पूर्ति के लिए वायुयान द्वारा ऋतुलेखी यंत्र (मीटिअरोग्राफ़) ऊपर ले जाने की व्यवस्था की गई। अन्य महत्वपूर्ण प्रगतियाँ जो प्रथम विश्वयुद्ध काल में हुई वे नॉर्वे देश के ऋतुविशेषज्ञ वी.बरकनीज़ एच. सोलवर्ग तथा जे. बरकनीज़ द्वारा ध्रवीय अग्रसिद्धांत (पोलर फ्रंट थ्योरी) के तथा चक्रवातों की उत्पत्ति के तरंग सिद्धांत के परिणाम हैं।
द्वितीय विश्वयुद्ध काल में मुख्यत: अधिक ऊँचाई पर उड़नेवाले वायुयानों के उपयोग के लिए ऋतु संबंधी सूचनाओं की माँग और बढ़ गई और इस माँग की पूर्ति के निर्मित्त विभिन्न ऊँचाइयों पर वायु के वेग तथा दिशा आदि के ज्ञान के लिए राडार प्रविधि (राडार टेकनीक) का विकास हुआ।
यहाँ पर हम यह कह सकते हैं कि इस पृथ्वी पर द्वितीय विश्वयुद्ध काल के बाद जो भी युद्ध हुए हैं या भविष्य में कहीं भी होंगे, मौसम कि सही जानकारी होना अति आवश्यक और महत्वपूर्ण होगा । उच्च तकनीक के मौसम उपकरण का प्रयोग दिन व दिन बढ़ता जाएगा ।
अंत में यही कहूँगा:- पृथ्वी पर मुख्य रूप से तीन मौसम होते हैं ग्रीष्म कालीन , वर्षा कालीन और शीत कालीन । तथा भारत में
ग्रीष्म कालीन:- मार्च से जून
वर्षा कालीन:- जुलाई से अक्टूबर
शीत कालीन:- नबम्बर से फरवरी
इसी परिवर्तन के साथ साथ हवा की दिशा बदलती है ,
“एक रचना”
हवाओं में झूलती कली
मुस्कुरा रही थी अपने आप में
मकरंद से भरपूर
कौन रोक सका खिलने से
न रोक पाया भँवरों को मिलने से
हवा को भी महका रही
बहका रही धरा
धरा जो अपनी धूरी पर
घूम रही मस्ती में
शुक्र है उसका
आभास न करा रही
अपनी ही चाल से
हवा बहका रही
दुनिया को समझा रही
फिजा में इतरा रही ।

अनुज भार्गव
पूर्व मौसम विज्ञानी , भारत मौसमविज्ञान विभाग
आभार :- गूगल

Related posts

Leave a Comment