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योग : एक परिचय


सुरभि नेगी :

योग का प्रादुर्भाव भारत में हजारों वर्ष पहले हुआ। यह हमारे ऋषि-मुनियों की देन है। योग तर्क का नहीं बल्कि साक्षात्कार का विषय है अतः इसकी व्याख्या सरल नहीं है। फिर भी हमारे ऋषि-मुनियों ने जो कुछ साक्षात्कार किया और अनुभव किया उसे सभी के लिए ग्राह्य और उपयोगी बनाने के लिये क्रमिक अभ्यास की विधियों सहित इस तार्किक और सुदृढ़ ढंग से प्रतिपादित किया कि वे आज के वैज्ञानिक युग में भी सर्वमान्य और लोकप्रिय हो रही है। आज योग मात्र आश्रमों और साधु, संतों तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि पिछले कुछ दशकों में इसने हमारे दैनिक जीवन में अपना स्थान बना लिया है और दुनिया भर में इसके प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है तथा इसे स्वीकार भी किया गया है। योग विज्ञान और इसकी विधियों को अब आधुनिक समाज की आवश्यकताओं एवं जीवन शैली के अनुरूप बनाते हुए उनके दैनिक जीवन में समावेश करने का प्रयत्न किया जा रहा है जिससे लोग तनाव मुक्त व्याधि मुक्त, कष्ट मुक्त, स्वस्थ, संतुष्ट और श्रेष्ठ जीवन व्यतीत कर पायें। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान सहित औषधि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के विशेषज्ञों ने रोग निवारण, रोगों से रक्षा करने एवं स्वास्थ्य के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करने में इन विधियों की भूमिका की सराहना की है।

दर्शन की छः पद्धतियों में से योग एक है। “महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्रों में योग के विभिन्न पहलुओं को क्रमबद्ध रूप से और परिष्कृत ढंग से इस प्रकार प्रतिपादित किया कि योग और समाधि का कोई पक्ष अव्यक्त न रह जाये और साधकों के लिए सर्वत्र और सर्वविधि उपयोगी सिद्ध हो। उन्होंने मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए योग के आठ अंगों का प्रतिपादन किया जो “अष्टांग योग के नाम से लोकप्रिय हैं। ये है यम (आत्मसंयम) नियम (आत्मशोधन के नियमों का पालन), आसन (शारीरिक मुद्राये). प्राणायाम (श्वास-प्रश्वास का नियमन), प्रत्याहार (इंद्रियों को उनके विषय से रोकना), धारणा (चिन्तन), ध्यान (तल्लीनता) और समाधि (पूर्ण आत्मतन्मय) । ऐसा माना जाता है कि इनके प्रारंभिक अभ्यास मात्र से शरीर को शुद्ध रक्त संचार द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य तथा ज्ञानेन्द्रियों के संयम द्वारा मानसिक शान्ति और पवित्रता प्रदान करने की क्षमता योग का अभ्यास मुख्यतः नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिये है परन्तु जनसाधारण द्वारा विशेष रूप से मानसिक और शारीरिक विकारों/रोगों से बचने और व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार लाने व तनावपूर्ण स्थितियों को दूर करने के लिए किया जाता है।

योग की परिभाषा

योग एक ऐसी पद्धति है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी अंतर्निहित शक्तियों को संतुलित रूप से विकसित कर सकता है। योग पूर्ण स्वानुभूति कराने के साधन प्रदान करता है। संस्कृत में योग का शाब्दिक अर्थ “जोड़ना है। तद्नुसार आत्मा को सर्वव्यापी परमात्मा से जोड़ने के साधन के रूप में योग को परिभाषित किया जा सकता है। महर्षि पतंजलि ने योग को चित्तवृत्तियों का निरोध बतलाया है।

योग के प्रकार

जप योग : सतत् स्मरण अथवा सतत् नामोच्चारण द्वारा अपने मन को किसी एक पवित्र नाम या अक्षर पर केन्द्रित करना जैसे ॐ राम, अल्लाह, ईश्वर, वाहे गुरू इत्यादि।

कर्म योग : कर्म योग हमें फल की इच्छा किये बिना कार्य करना सिखाता है। इस साधना के अन्तर्गत योगी अपने कर्तव्य का पालन सभी इच्छाओं को पृथक कर ईश्वर का आदेश समझ कर करता है।

ज्ञान योग : ज्ञान योग हमें आत्मा और अनात्मा में भेद करना, आप्त पुरूषों के वचनों और धर्म ग्रंथों के अध्ययन से अन्तरात्मा का ज्ञान प्राप्त करना, संतों की संगति और ध्यान का अभ्यास करना सिखाता है।

भक्ति योग : भक्ति योग ईश्वर के प्रति पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ समर्पण करने की पद्धति है। भक्ति योग के सच्चे अनुयायी अहंकार, निरादर और संसार से अछूते रहते हैं।

राज योग : राज योग, जो अष्टांग योग के नाम से लोकप्रिय है, से मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास करता है। इसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि आते हैं।

यम

यम का अभ्यास मन की शुद्धि (स्वच्छता) और धैर्य का मार्ग प्रशस्त करता है और एकाग्रता को बढ़ाता है। ये निम्नलिखित है

  1. अहिंसा – किसी को कष्ट न पहुँचाना
  2. सत्य – सत्य आचरण करना
  3. अस्तेय – चोरी नहीं करना
  4. ब्रह्मचर्य – इंद्रियों पर संयम
  5. अपरिग्रह – आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना

नियम

नियम पाँच हँ –

  1. शौच – ब्राह्य तथा आंतरिक शुद्धि
  2. संतोष – अवांछित आकांक्षाओं से बचना, जो प्राप्त है उससे सन्तुष्ट रहना
  3. तप – अनेक विघ्न और बाधाओं के मध्य भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सतत् प्रयास करना
  4. स्वाध्याय – आत्मा और परमात्मा के सही ज्ञान के लिए प्रामाणिक ग्रंथों और शास्त्रों का अध्ययन करना
  5. ईश्वर प्रणिधान – दिव्य शक्ति के समक्ष पूर्ण समर्पण करना

अन्य बहिरंग यौगिक अभ्यास

कुछ आसनों, मुद्राओं और प्राणायामों का धैर्य और विश्वास के साथ नित्य अभ्यास, हृदय, फेफड़ों, यकृत, अग्नाशय, गुर्दा, आँतो, स्नायुतंत्र, मासपेशियों, ऊतकों और शरीर की ग्रंथियों में शुद्ध और संतुलित रक्त संचार सुनिश्चित करता है. जठराग्नि को प्रदीप्त करता है. इंद्रियों, मन और वीर्य पर नियंत्रण प्रदान करके साधक को जीवनी शक्ति, बल और दीर्घायु प्रदान करता है।

सूर्य नमस्कार

सूर्य नमस्कार यौगिक क्रियाओं में सबसे लोकप्रिय एवं महत्त्वपूर्ण है जो आसन, प्राणायाम और मुद्राओं का लाभ एक साथ प्रदान करता है। इसमें बारह अवस्थाएं होती है जो प्रातः काल उगते हुए सूर्य के समक्ष की जाती है। सूर्य नमस्कार शरीर के सम्पूर्ण तंत्रिका-ग्रंथि और तंत्रिका मांसपेशीय तंत्र को ऊर्जावान बनाता है तथा इसका नियमित अभ्यास पूरे शरीर में शुद्ध रक्त का संतुलित संचार और सभी प्रणालियों में पूर्ण समन्वय प्रदान करता है। इस प्रकार यह साधक को सम्पूर्ण मानसिक और शारीरिक पुष्टता प्रदान करता है।

आसन

ये विशेष प्रकार की शारीरिक मुद्राएं हैं जो मन और शरीर को स्थैतिक खिंचाव के द्वारा स्थिरता प्रदान करती है। इनका उद्देश्य तंत्रिका पेशीय खिंचाव और साधारण पेशीयतान में उचित सुधार स्थापित करना है। आसनों को करने के दो मूलभूत सिद्धांत है- सुखानुभूति और स्थिरता। इनका तात्पर्य यह है कि आसनों की प्रवृत्ति केवल शारीरिक न होकर मनोशारीरिक है। प्रत्येक आसन सहजता के साथ क्षमतानुसार करना चाहिए। आसनों को करने में किसी प्रकार का झटका व थकावट नहीं होनी चाहिए।

आसनों को 1. ध्यानात्मक 2. संवर्धनात्मक व 3. विश्रामात्मक वर्गों में बांटा जा सकता है।

  1. ध्यानात्मक आसन – ध्यानात्मक आसन बैठकर किये जाने वाले आसन है जो शरीर को स्थिर व सुखमय अवस्था में रखते है। हाथों व पैरों के विभिन्न संयोजनों से अलग-अलग ध्यानात्मक आसन किये जाते हैं। ध्यानात्मक आसनों में मुख्यतः सिर, गर्दन और रीढ़ को सीधा रखना चाहिए।
  2. संवर्धनात्मक आसन – संवर्धनात्मक आसनों में स्थिर अवस्था में मांसपेशियों को खिचाव दिया जाता है जो उनमें आवश्यक सुधार लाता है। ये रीढ़ की हड्डी व मांसपेशियों को लचकदार व पृष्ठ भाग को सशक्त बनाते हैं। ये वक्षीय अंगों व उदरीय गुहाओं की कार्यप्रणाली में सुधार लाते हैं। ऐसे बहुत से संवर्धनात्मक आसन है जो बैठकर लेटकर या खड़े होकर किये जाते हैं।
  3. विश्रामात्मक आसन – विश्रामात्मक आसनों की संख्या कम है। ये सभी लेट कर किये जाते हैं जिनका उद्देश्य शरीर व मन को आराम पहुँचाना है।

प्राणायाम

प्राणायाम का अभ्यास श्वास सम्बन्धी आवेगों पर नियंत्रण प्रदान करता है जो स्वायत्त तंत्रिका आवेगों की धारा के लिए एक मार्ग सुनिश्चित करता है। श्वास को सुविधापूर्वक अधिक समय तक रोकना प्राणायाम की अनिवार्य तकनीक है। प्रारंभिक अभ्यास के दौरान श्वास को 12 अनुपात में नियंत्रित रूप से भरने व छोड़ने (पूरक व रेचक) पर ही अधिक बल दिया जाता है। रेचक को इतना नियंत्रित किया जाता है कि अगला मन्द व नियंत्रित श्वास लेने में कोई कठिनाई न हो। प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य स्वायत्त तंत्रिका तंत्र पर नियंत्रण प्राप्त करना तथा इसके प्रभाव से मन का नियंत्रण करना है। यह ध्यान के उच्चस्तरीय अभ्यास के लिए उपयोगी है।

प्रत्याहार

यह चित्त को नियंत्रित करने की एक विधि है। यह इंद्रियों को उनके विषयों से हटाने का अभ्यास है। यह मन को अस्वस्थ विचारों में उलझने से रोकने की प्रक्रिया है जिसे एक मनोवैज्ञानिक अभ्यास माना जा सकता है।

धारणा

चित्त को शरीर के किसी आन्तरिक अथवा बाह्य वस्तु, विचार या शब्द पर एकाग्र करना धारणा है। इससे एकाग्रता, स्मरणशक्ति और मेधाशक्ति में सुधार होता है।

ध्यान

चित्त की एकाग्र अवस्था में चित्त का उसी दिशा में निर्विघ्न निरंतर प्रवाह ध्यान कहलाता है। ध्यान के लगातार अभ्यास से गहन एकाग्रता की शक्ति प्राप्त होती है जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक ऊर्जा, मानसिक क्षमता, सृजनता, स्मृति, बुद्धिमत्ता, आत्मक्षमता और अर्न्तदृष्टि में बढ़ोत्तरी होती है। ध्यान का आधार आन्तरिक जागरूकता का विकास करना है।

समाधि

समाधि का शाब्दिक अर्थ ‘पूर्ण एकाकार’ होना है। इसे पूर्णता भी कहा जाता है। यह

चेतना की वह उच्चतम अवस्था है जहाँ ध्याता, ध्यान तथा ध्येय तीनों एकरूप हो जाते हैं। यह परमात्मा के साथ एकाकार और आनन्द की अवस्था है। समाधि योगाभ्यास की चरम ि है। इस स्थिति में दिव्य ज्ञान की समझ पैदा हो जाती है जिससे मोक्ष प्राप्ति संभव है। यही योग साधना का लक्ष्य है। समाधि के विकसित होने पर ‘आत्मज्ञान’ संभव होता है. यही आत्मा वास्तव में परमात्मा का स्वरूप है- अह ही सोहम् है- योगी को यह परम ज्ञान प्राप्त होता है कि वह मात्र शरीर नहीं है बल्कि प्रत्येक प्राणी में परमात्मा का ही अंश है। महर्षि पतंजलि के अनुसार- ईश्वर के समक्ष पूर्ण समर्पण भाव से समाधि की प्राप्ति संभव है।

षट्कर्म

ये यौगिक शुद्धि क्रियायें हैं जिनका प्रयोग शरीर व मन के उत्तरोत्तर सर्वांगीण विकास के लिये होता है। शुद्धि क्रियाओं को छ: वर्गों में बांटा जा सकता है, इसलिए इन्हें षट्कर्म कहते हैं। ये क्रियाएं हैं धौति, बस्ति, नेति त्राटक, नौलि और कपालभाति। इनमें प्रत्येक क्रिया के अपने उप-भाग है। इन क्रियाओं से उन ऊतकों की, जो विभिन्न अंगों व तंत्रों का निर्माण करते हैं, अनुकूल क्षमता का विस्तार और उनकी प्रतिक्रियात्मकता में वृद्धि होती है। ये क्रियायें विभिन्न प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियंत्रण और मनोशारीरिक संतुलन को स्थापित करती हैं। इन क्रियाओं की शुद्धीकरण प्रक्रिया में हवा, पानी, घर्षण और मैनीपुलेटिंग गतिया आदि सम्मिलित है। इन क्रियाओं से नासाग्रसनीय, कपालीय, जठरग्रासनलीय, मलाशय व आंतों की शुद्धि होती है।

बन्ध एवं मुद्रायें

ये शरीर में अर्धऐच्छिक व अनैच्छिक पेशियों की संकोचन स्थितियाँ है। ये महत्वपूर्ण अंगों में विसंकुलन (अधिक रक्त को कम करना), रक्त परिसंचलन में सुधार करके शारीरिक स्वास्थ्य में सहायता व भावनात्मक संतुलन बनाये रखती है। प्राणायामों के उपयोग के आधार पर मुद्राओं व बन्धों में भेद किया जाता है। जो मुद्राएं साधारणतया प्राणायाम में प्रयुक्त होती हैं उन्हें बन्ध कहा जाता है क्योंकि वे किसी तंत्र की गतिविधि को एक दिशा या स्थान में बांधने व नियंत्रित करने का कार्य करती हैं। जालंधर बंध, उड्डियान बंध व मूलबंध महत्त्वपूर्ण बंध है।

कुछ महत्वपूर्ण आसन और उनके लाभ

  1. पद्मासन – शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक साम्यावस्था के लिए।
  2. वज्रासन – भोजन के पश्चात 5 से 10 मिनट का नियमित अभ्यास पाचन को बढ़ा देता है। यह अनिद्रा और बेचैनी में लाभदायक है।
  3. मण्डूकासन – पाचन को तीव्र करता है। यह कब्ज, अपच और वायु विकार को दूर करता है।
  4. उत्तानमण्डूकासन – कटिशूल, ग्रीवा की पीड़ा, श्वसनी शोथ एवं मधुमेह के उपचार में लाभदायक है।
  5. गोमुखासन – दमा, घुटनों और टखनों में बात की पीड़ा को ठीक करने में लाभदायक है तथा फेफड़ों की क्षमता को बढ़ाता है।
  6. अर्ध-मत्स्येन्द्रासन – मधुमेह को नियंत्रित करता है और टखनों को बलशाली बनाता है।
  7. सिंहासन – ग्रीवा, नेत्र, नासिका और कर्ण से सम्बंधित विकारों को रोकता है।
  8. शवासन – शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शिथिलता प्रदान करता है।
  9. सुप्तपवनमुक्तासन – पाचन सम्बंधी समस्याओं, वायु विकार एवं कटिशूल को ठीक करने में उपयोगी है।
  10. ऊर्ध्व सर्वांगासन – नेत्र, मुख, मस्तिष्क एवं बालों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक है।
  11. सर्वांगासन – मेरुदण्ड में लचीलापन लाता है और श्वसनतंत्र एवं ग्रीवा के विकारों को होने से रोकता है।
  12. चक्रासन – सभी ग्रन्थियों के स्रोतों को एकरूप करता है. मोटापा घटाता है तथा तमक-श्वास एवं मधुमेह के उपचार में प्रभावी है।
  13. पश्चिमोत्तानासन – शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए उपयोगी है।
  14. कटिचक्रासन – कटिक्षेत्र, मेरुदण्ड एवं वक्षस्थल से सम्बन्धित विकारों के उपचार एवं उनके बचाव में उपयोगी है।
  15. उर्ध्व-हस्तोत्तानासन – कटि पीड़ा, तमक-श्वास एवं पाचन विकारों में उपयोगी है, मोटापा घटाता है और लम्बाई बढ़ाने में सहायक है।
  16. कोणासन – लम्बाई बढ़ाने में उपयोगी है। पाचन एवं श्वसन तंत्र तथा हृदय को ऊर्जावान बनाता है।

वैज्ञानिक अनुसंधान

योग की रोग निरोधक, स्वास्थ्य संवर्धक ओर रोग निवारक संभावनाओं के मूल्यांकन हेतु के भारत तथा विदेशों में इसका योजनाबद्ध नियंत्रित अनुसंधान हो रहा है। भारत में कुछ प्रसिद्ध संस्थानों जैसे शरीर क्रिया विज्ञान व सम्बंधित विज्ञान रक्षा संस्थान (डिपास) अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य तथा तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निम्हान्स). विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान तथा कैवल्यधाम योग संस्थान, लोनावला ने योग के प्रभाव के संबंध में जैविक, मनोवैज्ञानिक, शारीरिक चिकित्सा विषयों पर गहन अनुसंधान किया।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हुए प्रारंभिक अनुसंधान योग की शारीरिक क्षमताओं पर आधारित थे जिन्होंने अपनी हृदय गति और चयापचय को स्वेछानुसार कम करके. भूमिगत कक्ष जिसमें हवा का आवागमन न हो, में ठहरने की क्षमताओं का विकास कर लिया था। ऐसे कुछ योगियों पर शरीर क्रिया संबंधी अध्ययन किया गया था। इन अध्ययनों से ऐसे संकेत मिले कि योग का लम्बी अवधि तक अभ्यास स्वायत्त तंत्रिका तंत्र पर स्वैच्छिक नियंत्रण को विकसित करता है।

किये गए अध्ययनों से पता चलता है कि छः महीने का निरंतर यौगिक अभ्यास स्वैच्छिक स्नायु जाल की गतिविधियों को बढ़ाता है, स्वैच्छिक संतुलन को तनाव के दौरान स्थायित्व प्रदान करता है, अपेक्षित उच्च चयापचय की स्थिति उत्पन्न करता है, तापमान का नियमन करता है.. शारीरिक लचक और शरीर की अधिकतम कार्य करने की क्षमता के स्तर को सुधारता है। अध्ययनों में भी यह भी देखा गया कि योगाभ्यास वातावरण के अनुसार स्वयं को बदलने और ज्ञान प्राप्त कराने वाली प्रणालियों जैसे एकाग्रता, स्मरण शक्ति सीखने की क्षमता और सतर्कता को बढ़ाता है। आवश्यक उच्चरक्तचाप के नियंत्रण एवं प्रबंधन तथा शरीर क्रिया कार्यप्रणाली में कुछ चुनी हुई यौगिक क्रियाओं की उपचारात्मक क्षमता भी इन अध्ययनों में पायी गयी है।

चिकित्सा अध्ययनों में साफ तौर पर यह दर्शाया गया है कि योग के अभ्यास से फेफड़ों सम्बंधी जीर्ण प्रतिरोधात्मक रोगों जैसी श्वसनी शोथ और दमा का उपचार करने की क्षमता है। इसी तरह के परिणाम मधुमेह की चिकित्सा, कमर के निचले हिस्से में दर्द और तनावजन्य मनोदैहिक विकारों को ठीक करने में भी पाये गए हैं। डिपास में सम्पन्न एक अनुसंधान कार्य, जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में जीवन शैली परिवर्तन द्वारा हृदय धमनी रोग परिवर्तन जिसमें राज योग, ध्यान, अल्पा वसा युक्त रेशेदार आहार और एरोबिक व्यायाम सम्मिलित हैं, के परिणाम उत्साहवर्धक हैं।

कष्ट और रोग जिनका उपचार/सुधार योग चिकित्सा द्वारा संभव है:

योग चिकित्सा निम्नलिखित रोगों के प्रबंधन में प्रभावकारी है —

अमीबारुग्णता, अवसाद, त्वचा के रोग, कब्ज, जठरशोथ, उच्चरक्तचाप, पेप्टिक व्रण, गृधसी, अधोवायु, मिरगी, ग्रीवा कशेरूका सन्धि शोथ, उद्वेग विक्षिप्तता, सन्धिशोथ, तमक-श्वास, मधुमेह, अर्धांगवात, मोटापा, श्वसनपथ संक्रमण, अनिद्रा, स्थितिज विकार, रक्ताल्पता, क्षोभ्य आंत्र संलक्षण।

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