ऑफिस ऑर्डर किसानों के बच्चों की राह को नहीं उद्योगपतियों की राह को आसान करता है।

 ऑफिस ऑर्डर किसानों के बच्चों की राह को नहीं उद्योगपतियों की राह को आसान करता है।

ग्रेटर नॉएडा (आर्य सागर खारी) : ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के इस कार्यालय आदेश को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह ग्रेटर नोएडा के किसान परिवारों के बेरोजगार युवकों के स्थानीय क्षेत्र में संचालित स्थापित उद्योगों में 40 फीसदी रोजगार आरक्षण कोटे को सुनिश्चित करता है।

लेकिन यह महज एक शिगूफा है यह केवल ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया है। हिंदी में बोले तो उद्देश्य मापदंड यह केवल सरकार और कॉर्पोरेट सेक्टर के बीच उद्योग लगाने को लेकर नेगोशिएशन होती है तो उसमे ग्रेडिंग प्रणाली के तहत एमओयू की प्रक्रिया इससे आसान हो जाती है। प्राधिकरण के इस कार्यालय आदेश केवल उद्योगपतियों को ही फायदा होने वाला है उन्हें आवंटन में आर्थिक रियायत मिलेंगी।

ऐसा ही फायदा ग्रेटर नोएडा के अंग्रेजी मीडियम फाइव स्टार स्कूलों ने उठाया कि वह दाखिले में रिजर्व कोटा ट्यूशन फीस में 30 प्रतिशत छूट स्थानीय किसानों के बच्चों को देंगे लेकिन आज तक नहीं मिली।

यह कार्यालय आदेश विधिक तौर पर बाध्यकारी नहीं है क्योंकि ना तो यह शासनादेश है ना ही बोर्ड मीटिंग का लिखत कोई निर्णय है. रोजगार बाहरी लोगों को ही मिलेगा जैसा मिलता आया है. बेहतर होता उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास अधिनियम जिसके तहत तीनों प्राधिकरण की स्थापना की गई है उसकी उद्योग रोजगार नीति में संशोधन होता या कोई शासनादेश स्थानीय युवकों के रोजगार को लेकर पारित होता।

पढ़े लिखे समझदार स्थानीय लोग भी इस कार्यालय आदेश की वैधानिक प्रकृति को नहीं समझ पाए बहुत बड़ा आश्चर्य का विषय है इसे स्थाई रोजगार की गारंटी मानकर बहुत बड़ी उपलब्धि मान कर प्रचारित प्रसारित किया जा रहा है जबकि नतीजा वही है ढाक के तीन पात।

Kapil Choudhary

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