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वर्तमान परिस्थितियों में सकारात्मक रहें।

श्री मती ऊषा राणा चौधरी आत्म अनुभूति पर आधारित :

पूरा विश्व आज एक महामारी की चपेट में है। सभी के लिए उनका विगत वर्ष इसी तरह से कष्टमय बीता। हर तरफ़ से इंसान इस बड़ी भयावह परिस्थितियों से लड़ रहा है। आज कोई भी परिवार ऐसा नहीं जिसके मित्र या लगे संबंधी या पड़ोसी इस महामारी से पीड़ित ना हो। शारीरिक रूप से तो विषम परिस्थिति है ही लेकिन इसका मानसिक प्रभाव लोगो में बहुत अधिक देखा जा रहा है। यूँ तो भारत में हर परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति लोगो को विरासत में मिली है। यहाँ का परिवेश किसी भी प्रकार की चुनौतियों को हर दम स्वीकार कर लेता है। किंतु राजतंत्र में अनेकों दोष देखा कर समस्याओ को विस्तार कर अपनी ही पतन की भूमिका तैयार करने की आदत हमारे यहाँ सदैव ही रही है। इसका पूरा ही नुक़सान जनता को, गरीब वर्ग को झेलना पड़ रहा है।

कहते हैं काल का चक्र ऐसा चला कि प्रलय की चाल बना, और अब जीवन को पूरी तरह से ध्वस्त करने की क्रिया प्रारंभ हो चुकी है। पूरी दुनिया की प्रगति रुक गई है। महंगाई लाचारी और बेबसी ने भारत में दस्तक दी तो लोग मन से विचलित हो रहे हैं। हर परिवार सशंकित होकर डरता रहा है कि कहीं हम इसकी चपेट में तो नहीं आएँगे? और फिर हल्का स्वास्थ्य ख़राब होने पर यही डर कि हम अस्वस्थ हो गये हैं। लोग परामर्श लेते हैं कुछ ना कुछ दवा लेते हैं यहाँ तक की कई लोग तो स्वयं ही चिकित्सक बन गये है। इतनी दहशत मन में आ गई है की एक दूसरे की सुनी बातों पर अपनी सोच को छोड़ दुसरो की बातो पर विश्वास कर बैठते है। इससे एक अनावश्यक भय का जन्म हर किसी के भीतर पैदा हो गया है।

क्या कभी सोचा है कि क्यों डरने लगे हम ? क्या मृत्यु का डर है ? ये ना समझी और सावधानी न बरतने का अभाव है जो डरा रहा है। इस पर विचार किया गया है कभी? लोगों को हर दिन जाते हुए देख कर हम नकारात्मक रूप से बंधते जा रहे हैं। सरकार ने अपने स्तर से हर संभव प्रयास किये लेकिन हमने कितना महत्व दिया उन विषयों पर। अगर संभल कर चलते तो आज यह दर्दनाक परिस्थिति ना बनती। प्रजातंत्र में बहुत सी स्वतंत्रता है जो संविधान ने दी हैं लेकिन उनका दुरूपयोग हुआ है। कितने लोग अपने प्राणों से हाथ गँवा रहे हैं।

यह हर दिन आप सब देख रहे हैं लॉकडाउन है पर क्या उसका पालन हो रहा है ? कौन करेगा रक्षा, स्वयं प्रभु आयेंगें बचाने? जी नहीं हमें अपनी सुरक्षा खुद ही निश्चित करनी है। सब थक गये कहते-कहते लेकिन हम अपनी आदतों से कहाँ बाज आ रहे हैं। लोग मर रहे हैं और कुछ लोग अपने फायदे के लिए कालाबाज़ारी कर रहे हैं। लोग मर रहे हैं वो सब कुछ क्षण भर में हो रहा है लेकिन दूसरे लोग प्रचार कर अपनी बात से अन्यों के मन मस्तिष्क में कितनी गहरी ग़लत छाप छोड़ रहे हैं वो यह भी भूल बैठे कि यही हाल हमारा भी होना है। किसके लिए दवाओं की चोरी? कहाँ ले जायेंगीं ऐसा धन? क्या उपयोग होगा उस चोरी का जो किसी की ज़िंदगी बेचकर कमाया है? एक और गलती कर दी कि पाप का रूप जो अभी पूरा भोग भी नहीं पाये थे महापाप से संबंध बना लिए, ऐसी कैसी अज्ञानता ऐसा केसा लालच।

क्या करें इस समय में –

आस पास का वातावरण बहुत बेकार है लोगों को चीज़ो की कमी है तो क्या हम हमारे थोड़े प्रयास से उन लोगो की कुछ कमी दूर कर सकते हैं। कोई बेसहारा बीमार है तो उसकी हर संभव मदद करें। अपने मित्रों संबंधियों से संपर्क में रहे। सकारात्मक सोच रखें, डरावने समाचार या विचारों से दूरी बनायें और लोगो को गलत जानकारी न साँझा करे। अच्छी पुस्तकों का अध्ययन हर दिन करें। ध्यान, मंत्र जप, यज्ञ आदि कर अपना मन हल्का और शांत करे। कुछ समय नियमित रूप से जो उचित हो अवश्य ही करें। योगासन प्राणायाम करे अनुलोम विलोम प्राणायाम, भ्रामरी, सूक्ष्म यौगिक क्रियाए आज के वातावरण में सबसे अच्छा है। ध्यान का अभ्यास- इन सब से मन हल्का और स्वस्थ महसूस करेगा। यज्ञ करने से वातावरण शुद्ध और पवित्र होगा।

गूगल, कपूर, अजवाइन का धूपन कर घर के वातावरण को शुद्ध करें मन को बहुत शांति का अनुभव होगा। प्रसन्न रहने के लिए मन अनुसार संगीत सुने। कला एवं लेखन का शौक़ हो तो घर में समय के सदुपयोग के साथ अवश्य ही करें। अपनी सोच को सकारात्मक रख समय की बदलती परिस्थितियों को स्वीकार करें। पता नहीं अभी कितना समय और लगे सब कुछ व्यवस्थित होने मे। यह भी हमारे ही ऊपर निर्भर करता है कि कितना जल्दी हम सब मिलकर इस चुनौती का सामना कर सकते हैं। रक्षक बने विनाशक नहीं। परोपकार का भाव रखें संचय का नहीं।

महामारी सब के लिए है जो सजग रहेंगें वो व्यवस्थित रहेंगीं। डर कर काम नहीं चलने वाला, डर को साथ नहीं, सावधानी के साथ आगे का समय बिताने में एक दूसरे का सहयोग करने में ही आने वाले समय की सार्थकता होगी। कितना लंबा समय बीत गया कितने लोग काल में समा गये। अभी भी समय है प्रेम और सद्भावना को लेकर सकारात्मक सोच के साथ सावधानी पूर्वक जीवन का हर दिन स्वीकार कर चलते रहें। लॉकडाउन का समय है बाहर घुमने के दिन अभी नहीं है।

परिवारों के साथ रहकर ख़ुश रहें विषम परिस्थिति में ताल मेल बना कर चले। यह हम सब की ज़िम्मेदारी है सरकार केवल सहयोग कर सकती है जीवन कितना क़ीमती है आपके अपने परिवार के लिए यह भली भाँति समझ कर आगे के रास्ते तय करें यही एक प्रार्थना है कि आप स्वस्थ रहें प्रसन्न रहें और सकारात्मक रहे। टल जायेंगी हर परिस्थिति जब सब मिलकर करेंगें अच्छे संकल्प के साथ मुक़ाबला।

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