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वायनाड भूस्खलन: भारतीय सेना ने 31 घंटे में 190 फीट लंबा बेली ब्रिज बनाकर बहाल किया संपर्क, मेजर सीता शेल्के ने निभाई अहम भूमिका

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नोएडा। दिव्यांशु ठाकुर

केरल के वायनाड में हाल ही में हुए भूस्खलनों ने देशभर को हिला कर रख दिया। इस आपदा में तीन सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग घायल हो गए हैं। इस त्रासदी के चार दिन बाद भी राहत और बचाव कार्य पूरे जोर-शोर से चल रहा है। इसी बीच भारतीय सेना ने 31 घंटे लगातार काम करके 190 फीट लंबा बेली ब्रिज बनाकर चूरलमाला और मुंडक्कई के बीच संपर्क बहाल किया। इस पुल को बनाने वाली टीम में मेजर सीता शेल्के ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

वायनाड में भूस्खलन की घटना

30 जुलाई को वायनाड जिले के मेप्पाडी के पास पहाड़ी इलाकों में तीन बड़े भूस्खलन हुए। पहला भूस्खलन रात करीब एक बजे मुंडक्कई टाउन में हुआ। इसके बाद सुबह चार बजे चूरलमाला स्कूल के पास दूसरा भूस्खलन हुआ, जिससे स्कूल और आसपास के घरों में पानी और कीचड़ भर गया। इन भूस्खलनों ने मेप्पाडी, मुंडक्कई टाउन और चूरलमाला में भारी तबाही मचाई और चूरलमाला और मुंडक्कई के बीच का कंक्रीट का पुल भी नष्ट हो गया।

बचाव कार्य और पुल निर्माण

आपदा के बाद बचाव और राहत कार्य में सबसे बड़ी चुनौती थी, टूटी हुई कड़ी को फिर से जोड़ना। भारतीय सेना की इंजीनियरिंग टास्क फोर्स, मद्रास इंजीनियर ग्रुप (MEG) ने इस काम का बीड़ा उठाया। 30 जुलाई को 20 ट्रकों में बेंगलुरु से चूरलमाला पुल के पैनल भेजे गए। 31 जुलाई की सुबह नौ बजे MEG के 144 अधिकारियों ने पुल निर्माण का काम शुरू किया और 1 अगस्त की शाम छह बजे 190 फीट लंबा बेली ब्रिज बनकर तैयार हो गया।

मेजर सीता शेल्के की भूमिका

मेजर सीता अशोक शेल्के, जो महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के गडिलगांव गांव की रहने वाली हैं, ने इस पुल के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी टीम के साथ 48 घंटे तक लगातार काम किया, मुश्किल से तीन मिनट का ब्रेक लिया। मेजर सीता ने बताया कि उनका एकमात्र लक्ष्य पुल को जल्द से जल्द पूरा करना था।

चुनौतियों का सामना

पुल निर्माण के दौरान मौसम और पर्याप्त जगह की कमी ने काम को चुनौतीपूर्ण बना दिया। इसके बावजूद, सेना के अधिकारी रातभर बिना रुके काम करते रहे। पुल के निर्माण के साथ ही सुबह तीन बजे से 100 फीट लंबे फुटब्रिज पर भी काम शुरू किया गया, जिसे सुबह छह बजे तक पूरा कर लिया गया।

सीता शेल्के: एक प्रेरणादायक यात्रा

मेजर सीता शेल्के ने बचपन से ही सेना में जाने का सपना देखा था। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और तीसरे प्रयास में एसएसबी परीक्षा पास की। उनकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई 2015 में काम आई, जब वह जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1-ए पर असाइनमेंट के लिए तैनात टीम का हिस्सा थीं।

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