अपनी जेब में आना चाहिए, प्राधिकरण को नफा हो या नुकसान

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ग्रेटर नोएडा। कपिल चौधरी

ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के वित्त विभाग में फाइलों को महीना तक रोकना एक आम बात हो गई है। जिन फाइलों के होने से प्राधिकरण को ही लाभ होना है प्राधिकरण को पैसा आना है उन फाइलों को भी रोक कर रखा जाता है जब तक उनमें सुविधा शुल्क इनका अपना नहीं मिल जाता, तब तक फाइलों को नहीं किया जाता है। चाहे प्राधिकरण को पैसा मिले या ना मिले, ऐसे अधिकारी कर्मचारियों के कारण ही प्राधिकरण की छवि दिन पर दिन धूमिल हो रही है।

प्राधिकरण में पैसा जमा करना है तो भी देना होगा सुविधा शुल्क

ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को लीज रेंट के तौर पर पैसा मिलता है लेकिन लीज रेंट की कैलकुलेशन की फाइल जब वित्त विभाग के पास पहुंचती है तो उन्हें भी अपने सुविधा शुल्क के लिए रोका जाता है लोगों को प्राधिकरण को पैसा देने के लिए भी महीना तक घूमना पड़ता है। बिल्डरों की कोई कैलकुलेशन होती है या उन्हें कोई नियम अनुसार छूट दी जाती है बिल्डर प्रतिनिधि बताते हैं वित्त विभाग में सुविधा शुल्क दिए बिना उन्हें कोई जानकारी नहीं मिलती है। यहां तक की किसान आबादी की कोई फाइल पेमेंट क्रॉस चेक करने के लिए वित्त विभाग में आ जाती है तो उसे भी 25 से 30 दिन तक बिना शुल्क लिए नहीं भेजा जाता है। वित्त विभाग एक सिंडिकेट बनाकर के कार्य कर रहा है।

एक दशक से ज्यादा समय से एक ही सीट पर क्यों?

वित्त विभाग में ज्यादातर कर्मचारी और अधिकारी ऐसे हैं जिन्हें एक दशक से भी ज्यादा समय हो गया है। इसी विभाग में कार्य करते हुए कहा जाता है अगर कोई अधिकारी कर्मचारी लंबे समय तक एक ही सीट पर टिका रहे वहां भ्रष्टाचार होने संभावना बहुत अधिक हो जाती है और एक ही सीट पर लंबे समय तक जमे रहना भी भ्रष्टाचार है।

अधिकारी और कर्मचारियों की भ्रष्टाचार में भूमिका की गहनता से जांच होनी चाहिए। कहा जाता है कि विभाग के बड़े अधिकारियों की मिलीभगत से भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जाता है साथ ही उनकी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होती है। प्राधिकरण को कुछ समय के अंतराल पर विभागों का गुप्त सर्वे करना चाहिए। जिससे कि उन्हें अपने अधिकारियों की कार्यशैली और भ्रष्टाचार का पता लग सके।

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