Monday, 12 May 2026 | 04:35 PM
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नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्रों में अल्प, निम्न व मध्यम आय वर्ग के आवासीय संकट पर एक पड़ताल

औद्योगिक व नगरीय विकास प्राधिकरणों की योजनाओं में प्रायः उच्च आय वर्ग के लिए ही बड़े प्रोजेक्ट और लक्ज़री फ्लैट दिखाई देते हैं। जबकि योजनाओं में ईडब्ल्यूएस (अल्प आय वर्ग), एलआईजी (निम्न आय वर्ग) और एमआईजी (मध्यम आय वर्ग) के लिए भूमि तो आरक्षित होती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहती है।
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क्या स्मार्ट सिटी के मज़दूरों के लिए “स्मार्ट” घर हैं?
नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र देश के सबसे तेज़ी से विकसित होते औद्योगिक शहरी क्षेत्रों में गिने जाते हैं। ऊँचे-ऊँचे टावर, चौड़ी सड़कें, मेट्रो नेटवर्क और बड़े-बड़े कॉरपोरेट पार्क इन नगरों की पहचान बन चुके हैं। लेकिन इन “आधुनिक” शहरों की चमक-धमक के पीछे एक अनकही कहानी छिपी है।  उस वर्ग की, जिसने इन शहरों को खड़ा किया और रोज़मर्रा की सेवाएँ चलाए रखी, मगर जिसके पास खुद के सिर पर एक सुरक्षित छत तक नहीं है।

विकास का चेहरा और आधारभूत सवाल
औद्योगिक व नगरीय विकास प्राधिकरणों की योजनाओं में प्रायः उच्च आय वर्ग के लिए ही बड़े प्रोजेक्ट और लक्ज़री फ्लैट दिखाई देते हैं। जबकि योजनाओं में ईडब्ल्यूएस (अल्प आय वर्ग), एलआईजी (निम्न आय वर्ग) और एमआईजी (मध्यम आय वर्ग) के लिए भूमि तो आरक्षित होती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहती है।

उनकी पहल के तहत सभी बिल्डरों से पूछा गया है कि उन्हें आवंटित ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्टों में अब तक कितने ईडब्ल्यूएस, एलआईजी व एमआईजी फ्लैट बने हैं। यह पूछताछ बिल्डरों में हड़कंप मचा रही है, क्योंकि अधिकतर ने ऊँची कीमत वाले फ्लैटों का निर्माण तो कर लिया, लेकिन कम आय वर्गों के हिस्से की भूमि विकसित भी नहीं की।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से यह सवाल सार्वजनिक तौर पर उठाया कि 2017 से अब तक इन तीनों प्राधिकरण क्षेत्रों में अल्प, निम्न और मध्यम आय वर्ग के लिए कितने मकान बनाए गए हैं? उन्होंने यह भी पूछा कि बिल्डर योजनाओं में इन वर्गों के लिए क्या प्रावधान हैं और प्रधानमंत्री आवास योजना यहाँ लागू क्यों नहीं हो सकती?

यह एक ऐसा प्रश्न है, जो हर उस मज़दूर, घरेलू कामगार, सफ़ाईकर्मी और छोटे-मोटे कारोबारी के मन में भी उठता है, जो इन नगरों की रीढ़ है। योजनाएँ बनीं, पर टिक नहीं पाईं। यमुना प्राधिकरण के पूर्व सीईओ ने एक बार ईडब्ल्यूएस व एलआईजी के लिए तीस वर्गमीटर के आवासीय भूखंडों की योजना तैयार की थी, मगर उनकी सेवानिवृत्ति के साथ वह योजना भी ठंडे बस्ते में चली गई। इस तरह के उदाहरण बताते हैं कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और निरंतरता के बिना कोई भी “समावेशी” शहरीकरण संभव नहीं।
दैनिक जीवन की सच्चाई
क्या यह व्यावहारिक है कि फैक्ट्री मज़दूर, सफ़ाईकर्मी, सुरक्षा गार्ड, घरेलू सहायिकाएँ रोज़ दूर-दराज़ के गाँवों से आकर इन शहरों को सेवाएँ देते रहें? क्या यह न्यायसंगत है कि जिन हाथों ने शहर बनाए, वही स्लम या गाँव के जर्जर मकानों में रहने को मजबूर रहें?
नया रास्ता: सबके लिए शहर
आज जरूरत है कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण अपने मास्टर प्लान और बिल्डर नीतियों की गंभीर समीक्षा करें।
ईडब्ल्यूएस/एलआईजी/एमआईजी यूनिट्स का निर्माण सुनिश्चित करना: केवल कागज़ पर आरक्षित भूमि नहीं, बल्कि समयबद्ध निर्माण व आवंटन।
प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी केंद्रीय योजनाओं का वास्तविक क्रियान्वयन: ताकि सब्सिडी व आसान लोन का लाभ शहर के श्रमिक वर्ग तक पहुँचे।
सस्ती रेंटल हाउसिंग: जिनको घर खरीदना संभव न हो, उनके लिए भी सम्मानजनक किराये के आवास।
डेटा की पारदर्शिता: हर प्राधिकरण को अपनी वेबसाइट व रिपोर्ट्स में स्पष्ट आँकड़े प्रकाशित करने चाहिए।

शहर तभी “स्मार्ट” बन सकते हैं, जब उनमें काम करने वाले हर व्यक्ति को सुरक्षित व सुलभ आवास मिले। अभी तक इन नगरों में विकास का अर्थ ऊँचे टावर और एक्सप्रेसवे तक सीमित रहा है, लेकिन अब समय है कि विकास की बुनियाद मानव संसाधन को भी उसका हक मिले।