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Greater Noida News: नीमका जेल में बंद मां के 5 साल के बेटे का नर्सरी में दाखिला, स्कूल बस लेने आएगी जेल तक
फरीदाबाद की नीमका जेल में अपनी मां के साथ रह रहे पांच साल के बच्चे के भविष्य को संवारने के लिए जेल प्रशासन ने एक सराहनीय पहल की है।
- sakshi choudhary
- 31 Oct, 2026
फरीदाबाद की नीमका जेल में अपनी मां के साथ रह रहे पांच साल के बच्चे के भविष्य को संवारने के लिए जेल प्रशासन ने एक सराहनीय पहल की है। बच्चे का दाखिला जेल परिसर के बाहर एक निजी स्कूल में नर्सरी कक्षा में कराया जा रहा है। खास बात यह है कि बच्चे को स्कूल पहुंचाने और वापस जेल लाने के लिए स्कूल बस की व्यवस्था भी की जाएगी। इसके लिए बस जेल तक आएगी और सुरक्षा के जरूरी इंतजाम किए जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मां के जेल में होने की सजा बच्चे की शिक्षा और बचपन को प्रभावित न करे।
जेल में बंद मां के साथ रह रहा है बच्चा
जानकारी के अनुसार, पांच वर्षीय बच्चा अपनी मां के साथ नीमका जेल में रह रहा है। जेल प्रशासन ने बच्चे की उम्र और शिक्षा की जरूरत को ध्यान में रखते हुए उसे सामान्य बच्चों की तरह स्कूल में पढ़ाने की व्यवस्था की है। निजी स्कूल में दाखिले के साथ उसके नियमित आने-जाने की जिम्मेदारी भी तय की जा रही है। स्कूल बस जेल तक पहुंचेगी, जिससे बच्चे को सुरक्षित तरीके से स्कूल भेजा जा सकेगा। इस व्यवस्था में जेल प्रशासन और स्कूल के बीच समन्वय रखा जाएगा।
बच्चे की शिक्षा और सुरक्षा दोनों पर ध्यान
जेल में रहने वाले छोटे बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और मानसिक विकास को लेकर कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश जेल मैनुअल में भी चार से छह वर्ष की उम्र के बच्चों को जेल से बाहर शैक्षणिक संस्थान में दाखिला दिलाने और उनके लिए परिवहन की व्यवस्था करने का प्रावधान है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बच्चों को जेल के बाहर स्कूलों में पढ़ाने और उनके समग्र विकास के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने पर जोर दिया है। ऐसे में नीमका जेल की यह पहल बच्चे को दूसरे बच्चों के साथ पढ़ने और सामान्य शैक्षणिक वातावरण पाने का अवसर देगी।
मां के साथ रहकर भी सामान्य बचपन का अवसर
किसी बच्चे को उसके माता-पिता के अपराध की सजा नहीं मिलनी चाहिए। जेल प्रशासन की इस व्यवस्था से बच्चे को अपनी मां से अलग हुए बिना स्कूल जाने का अवसर मिलेगा। स्कूल में दूसरे बच्चों के साथ पढ़ाई, खेल और गतिविधियों में भाग लेने से उसके सामाजिक और मानसिक विकास को भी मदद मिल सकती है। इस पहल को जेल में रह रहे बच्चों के अधिकारों और शिक्षा की जरूरतों के प्रति संवेदनशील व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।