Monday, 12 May 2026 | 04:35 PM
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चंद कदम दूर चमक-दमक, पर विकास से कोसों दूर ग्राम ब्रह्मपुर गजरौला उर्फ़ नवादा की जमीनी हकीकत

लेकिन गांव के भीतर कदम रखते ही यह आधुनिकता और सुविधा की तस्वीर बदल जाती है। यहां बुनियादी सुविधाओं का गंभीर अभाव है।
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Noida Views सीरीज़: ग्रेटर नोएडा के गांवों की असली तस्वीर।


ग्रेटर नोएडा की पहचान परी चौक से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित ब्रह्मपुर गजरौला उर्फ़ नवादा चारों ओर से चौड़ी और व्यस्त सड़कों से घिरा है। गांव के एक तरफ ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GNIDA) के कार्यालय को जाने वाली 105 मीटर चौड़ी सड़क है, जिस पर अक्सर VIP और अफसरों का आवागमन होता है, जबकि दूसरी तरफ 60 मीटर चौड़ी सड़क गुजरती है।

गांव के एक छोर पर ग्रेटर नोएडा का सबसे बड़ा सम्राट मिहिर भोज पार्क (सिटी पार्क) है, तो दूसरी तरफ शहीद विजय सिंह पथिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की दीवार गांव से सटी हुई है। पास में अल्फा-2 सेक्टर, जेपी ग्रीन्स, गोदरेज जैसी हाई-प्रोफाइल सोसाइटियां हैं, और कुछ ही दूरी पर स्टारबक्स, क्रोमा, वेस्टसाइड, एप्पल स्टोर, KFC, बर्गर किंग जैसे नामी ब्रांड मौजूद हैं।

लेकिन गांव के भीतर कदम रखते ही यह आधुनिकता और सुविधा की तस्वीर बदल जाती है। यहां बुनियादी सुविधाओं का गंभीर अभाव है।


स्ट्रीट लाइट का अभाव और खराब व्यवस्था

गांव के मुख्य प्रवेश मार्गों पर स्ट्रीट लाइट का नामोनिशान तक नहीं है। अंधेरे में इन रास्तों से गुजरना सिर्फ असुरक्षित है, बल्कि हादसों का भी खतरा बढ़ा देता है, खासकर रात के समय पैदल चलने वाले, साइकिल और बाइक सवारों के लिए।

गांव के अंदर भले कुछ जगह स्ट्रीट लाइट लगी हों, लेकिन उनका आधा हिस्सा खराब है। इससे रात में गलियां अंधेरे में डूब जाती हैं और आपराधिक गतिविधियों चोरी-छिनैती जैसी घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है।


कचरा प्रबंधन में लापरवाही

गांव से कचरा उठाने वाली गाड़ी नियमित रूप से नहीं आती। नतीजतन, जगह-जगह कूड़े के ढेर जमा हो जाते हैं। यह कचरा अक्सर नालियों में गिर जाता है, जिससे पानी की निकासी रुक जाती है और सड़क पर गंदा पानी फैल जाता है।

इससे गांव में बदबू फैलती है, मच्छरों मक्खियों का प्रकोप बढ़ता है और डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा हमेशा बना रहता है।



सीवर ओवरफ्लो की लगातार समस्या

गांव के कई हिस्सों में सीवर लाइन ओवरफ्लो रहती है। गंदा पानी सड़कों पर बहता है, जिससे राहगीरों का निकलना मुश्किल हो जाता है। बरसात के दिनों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

यह सिर्फ स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि पानी के संपर्क में आने से बच्चों और बुजुर्गों में त्वचा रोग और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।



ग्रीन बेल्ट का अधूरा विकास

गांव में निर्धारित ग्रीन बेल्ट का विकास आज तक अधूरा है। कहीं कचरे के ढेर पड़े हैं, तो कहीं सीमांकन तक नहीं हुआ।

पास में बने रिसॉर्ट इस ग्रीन बेल्ट का उपयोग कूड़ा फेंकने और जल निकासी के लिए करता है, जिससे यहां हर समय गंदगी और बदबू बनी रहती है। ग्रीन बेल्ट का यह हाल केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि गांववासियों को हरियाली और स्वच्छ हवा से भी वंचित कर रहा है।


तालाब की उपेक्षा

गांव के अंदर शिव मंदिर के पास का तालाब, जिसे प्राधिकरण ने पहले विकसित किया था, अब अनुरक्षण के अभाव में नीरस और जर्जर पड़ा है।


सिटी पार्क के रास्ते की गंदगी और जलभराव

सिटी पार्क की तरफ से गांव में आने वाले रास्ते पर हमेशा गंदगी और कीचड़ रहता है। गांव के मुख्य द्वार के पास, पार्किंग एरिया में स्थायी जलभराव की स्थिति बनी रहती है।

यह सिर्फ देखने में खराब लगता है बल्कि लोगों के आवागमन और वाहनों की आवाजाही में भी बाधा डालता है।


खेल सुविधाओं का अभाव

विडंबना यह है कि गांव की जमीन पर ही ग्रेटर नोएडा का सबसे बड़ा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स बना है, लेकिन गांव के बच्चों के लिए कोई खेल मैदान निर्धारित नहीं है।

बच्चों को या तो गलियों में खेलना पड़ता है या फिर खाली पड़ी गंदी जगहों पर, जिससे उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों पर नकारात्मक असर पड़ता है।


बारातघर की अधूरी योजना और टूटी जालियां

गांव का बारातघर अलग ढांचे में है, जबकि कार्यक्रमों और टेंट लगाने के लिए मैदान उससे काफी दूर स्थित है। इस मैदान का लेवल सड़क से नीचा है, जिससे बरसात में यहां जलभराव हो जाता है और शादी या अन्य कार्यक्रमों में आने वाले लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है।

बारातघर में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है तो पर्याप्त पानी की व्यवस्था है, ही साफ शौचालय। इसके अलावा, गांव में कई जगह कलवर्ट की जगह टूटी हुई जालियां लगी हैं, जो राहगीरों के लिए गंभीर हादसों का कारण बन सकती हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए।


गांव की अनदेखी और ग्रामवासियों का रोष

यह शायद ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GNIDA) के अधिसूचित क्षेत्र का एकमात्र गांव है, जिसके किसानों को 4%, 6% या 10% आबादी भूखंड तक नहीं मिले। अन्य गांवों की तरह कोई अतिरिक्त प्रतिकर भी नहीं दिया गया।

ग्रामवासियों का कहना है कि उन्होंने IGRS पोर्टल, सोशल मीडिया और पत्रों के माध्यम से कई बार शिकायत की। प्राधिकरण के अधिकारी स्थल निरीक्षण कर आश्वासन तो देते हैं, लेकिन काम कभी पूरा नहीं होता।

इससे ग्रामीणों में गहरा रोष है और उन्हें लगता है कि विकास का हिस्सा बनने के बावजूद उन्हें सिर्फ वादे और कागजी घोषणाएं ही मिली हैं।